
जालंधर (न्यूज़ लिंकर्स ब्यूरों) : न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMIC) जालंधर सुश्री शिवानी गर्ग की अदालत ने 17 दिसंबर 2025 (बुधवार) को चेक बाउंस के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने जालंधर के जानें-मानें वकील करण कालिया की सशक्त व अनुभवी दलीलों को मान्यता देते हुए आरोपी साबिर आलम पुत्र अब्दुल जलीन, निवासी मोहल्ला बाबा दीप सिंह नगर नज़दीक ढ़ोगरी रोड, रेरू पिंड, जालंधर को परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत दोषी करार दिया गया है और उसे एक साल के साधारण कारावास तथा तीन हज़ार रूपए के जुर्माने की सज़ा सुनाई गयी है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में दोषी को तीन माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। इसके साथ ही अदालत ने दोषी को CrPC की धारा 357 एवं BNSS की धारा 395 के तहत शिकायतकर्ता को ₹1,00,000 की चेक की राशि एवं उतनी ही रकम का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है, जिसे अपील या रिवीजन की अवधि समाप्त होने के बाद वसूला जाएगा। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि आर्थिक अपराधों में दोषी को प्रोबेशन देना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसे अपराध न केवल व्यक्तिगत रूप से शिकायतकर्ता को हानि पहुँचाते हैं, बल्कि देश की आर्थिक व्यवस्था को भी कमजोर करते हैं। वही इस मामले की पैरवी में एडवोकेट करण कालिया के साथ युवा वकील कुणाल कालिया ने भी सक्रिय भूमिका निभाई और पूरे ट्रायल के दौरान प्रभावी कानूनी सहयोग प्रदान किया। उल्लेखनीय है कि शिकायतकर्ता संजय कुमार पुत्र श्री सुरेंदर कुमार, निवासी गुलमर्ग कॉलोनी, नज़दीक लंबा पिंड चौक, जालंधर ने 1 जुलाई 2020 को आरोपी के खिलाफ परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि सितंबर 2019 में आरोपी ने अपने घरेलू खर्च के लिए शिकायतकर्ता से ₹1,00,000 की मांग की, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने अपने बचत खाते से यह राशि निकाल कर आरोपी को दी। आरोपी ने आश्वासन दिया कि यह राशि 5-6 महीनों में वापस कर दी जाएगी। आरोपी ने 19 मार्च 2020 को भुगतान के लिए शिकायतकर्ता के नाम ₹1,00,000 का चेक जारी किया। शिकायतकर्ता ने चेक बैंक में प्रस्तुत किया, लेकिन आरोपी साबिर के बैंक खाते में अपर्याप्त फंड होने के कारण चेक बाउंस हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने आरोपी को लीगल नोटिस भेजा, जिसे 22 अप्रैल 2020 को प्राप्त किया गया। मगर आरोपी ने न तो राशि का भुगतान किया और न ही कोई जवाब दिया। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने अपने खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के बावजूद जानबूझकर और धोखाधड़ीपूर्ण इरादे से चेक जारी किया, जिससे वह NI एक्ट की धारा 138 के तहत अपराधी है।








