
जालंधर (न्यूज़ लिंकर्स ब्यूरो) : न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMIC) जालंधर सुश्री शिवानी गर्ग की अदालत ने 09 जून 2026 को चेक बाउंस के एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी कमलजीत सिंह पुत्र मिल्खा सिंह निवासी वार्ड नं. 6, गुरु नानक नगर, भोगपुर, जिला जालंधर को परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act), 1881 की धारा 138 के तहत दोषी करार दिया है।अदालत ने आरोपी को एक वर्ष के साधारण कारावास तथा ₹3,000 जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में आरोपी को तीन माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। इसके अतिरिक्त अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 395 के अंतर्गत दोषी को आदेश दिया है कि चेक राशि के बराबर ₹5 लाख का मुआवजा शिकायतकर्ता को अदा किया जाए, जिसकी वसूली अपील अथवा रिवीजन की अवधि समाप्त होने के बाद कानून अनुसार की जाएगी।

मामले की जानकारी देते हुए जालंधर के जानें-मानें युवा वकील कुणाल कालिया ने बताया कि शिकायतकर्ता एवं भाजपा पार्षदपति भगवंत प्रभाकर पुत्र श्री सुरेन्द्र प्रभाकर, निवासी न्यू अमन नगर, जालंधर द्वारा 19 अक्टूबर 2023 को आरोपी के विरुद्ध एन.आई. एक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दायर की गई थी। शिकायत के अनुसार अप्रैल 2023 में आरोपी ने अपने व्यवसायिक एवं पारिवारिक आवश्यकताओं के लिए शिकायतकर्ता से ₹5,00,000 का लोन लिया था। ऋण राशि के भुगतान हेतु आरोपी द्वारा ₹5 लाख का चेक जारी किया गया, जिसे शिकायतकर्ता ने बैंक में प्रस्तुत किया। किन्तु आरोपी के खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के कारण चेक “फंड्स इंसफिशिएंट” की टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया। इसके पश्चात आरोपी को लीगल नोटिस भेजा गया, लेकिन उसने निर्धारित अवधि में न तो भुगतान किया और न ही कोई संतोषजनक जवाब दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने अदालत की शरण ली। शिकायतकर्ता का आरोप था कि आरोपी ने अपने बैंक खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के बावजूद जानबूझकर एवं दुर्भावनापूर्ण मंशा से चेक जारी किया, जिससे उसने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत अपराध किया है। मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता कुणाल कालिया ने शिकायतकर्ता की ओर से प्रभावी पैरवी करते हुए सभी आवश्यक दस्तावेज एवं साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता करण कालिया ने भी पूरे ट्रायल के दौरान महत्वपूर्ण कानूनी सहयोग प्रदान किया। माननीय अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि शिकायतकर्ता पक्ष अपने आरोपों को सिद्ध करने में सफल रहा है तथा आरोपी अपने बचाव में कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। अदालत ने माना कि आरोपी द्वारा जारी किया गया चेक एक वैध देनदारी के निर्वहन हेतु दिया गया था और उसके अनादर (Dishonour) के सभी आवश्यक तत्व इस मामले में सिद्ध होते हैं। परिणामस्वरूप अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए उपरोक्त सजा सुनाई। वही इस मामले में बचाव पक्ष फैसले के खिलाफ सेशन कोर्ट में अपील दायर कर सकता है।










