NATIONAL

🛑अमर शहीद लाला जगत नारायण : एक युग पुरुष की जीवन यात्रा
🛑राष्ट्रीयता, प्रगतिशीलता, व्यक्तिगत साहस, निड़रता, निर्भीकता जैसे उच्च संस्कारों से परिपूर्ण महामानव की अमर-गाथा
🛑42वीं पुण्यतिथि पर न्यूज़ लिंकर्स की विशेष प्रस्तुति

-हितेश सूरी

अमर शहीद लाला जगत नारायण जैसे महामानव ईश्वर कृपा से पृथ्वी पर जन्म ही समाज के उद्घार व पथ-प्रदर्शन हेतु लेते है l अत्यंत खेदजनक है की आधुनिकता के इस दौर में ऐसे युग पुरुष आज केवल कथा-कहानियों तक सिमटते जा रहे है l लाला जी की 42वीं पुण्यतिथि पर उनकी जीवन यात्रा के कुछ पहलू प्राचार्य सेवा राम प्रभाकर एवं प्रो सतपाल नरुला द्वारा लाला जी की जीवन यात्रा पर लिखी एक पथ-प्रदर्शक पुस्तक मानवता के प्रहरी से साभार प्रकाशित कर रहे है ताकि नई पीढ़ी लाला जी के अत्यंत सादा चरित्र जीवन के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य जान सके व अपने जीवन में उतार सके l लाला जगत नारायण जी के पूर्वज दीवान मूल राज चोपड़ा थे, जिन्हें शेर- ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का एक विश्वस्त अधिकारी समझा जाता था तथा वह मुल्तान (अब पकिस्तान में) के गवर्नर थे।दीवान मूल राज चोपड़ा भी महाराजा रणजीत सिंह से काफी प्रभावित थे और उन्होंने एक अधिकारी के तौर पर पूर्ण निष्ठा व समर्पण भाव से कार्य किया तथा कई वर्षों तक सेवारत रहे। महाराजा रणजीत सिंह बहुत उदार हृदयी थे, उन्होंने श्री दीवान मूल राज चोपड़ा की अनन्य स्वामी भक्ति से प्रभावित व प्रसन्न होकर उन्हें वजीराबाद (अब पाकिस्तान में) में कुछ भूमि तथा ‘दीवानों की हवेली’ नाम से प्रसिद्ध एक महल उपहार स्वरूप प्रदान कर दिया। बता दे कि उन दिनों दीवान को अच्छे अधिकार प्राप्त होते थे। उन्हें ‘छोटी मोहर वाले’ कहकर पुकारा जाता था तथा उनकी मोहर के बिना चिनाब नदी को पार करने की अनुमति नहीं थी। लाला जगत नारायण जी के पूर्वज वजीराबाद में ‘गली आर्यावाली वेहड़ा चोपडा दा मोहल्ला दीवान’ में स्थित एक विशाल मकान में रहते थे जो छोटी ईंटों से बना हुआ था तथा जिसमें 9 कमरे थे। लाला जी के पिता श्री लखमी दास चोपड़ा, श्री दीवान मूल राज चोपड़ा के पौत्रों में से एक थे। श्री लखमी दास चोपड़ा का जन्म व पालन-पोषण वजीराबाद में उसी महल में हुआ जो उन्हें महाराजा रणजीत सिंह ने भेंट किया था परन्तु श्री लखमी दास ने अपने पूर्वजों से हटकर अपने लिए अलग व्यवसाय चुना, वजीराबाद में उन्होंने ब्रिटिश सरकार के पुलिस बल में जाना स्वीकार कर लिया। श्री लखमी दास का विवाह श्रीमती लाल देवी से हुआ। श्रीमती लाल देवी एक सुसंस्कारित आर्य समाजी परिवार से सम्बन्धित थीं। इस प्रकार श्रीमती लाल देवी के माध्यम से श्री लखमी दास आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द के आदर्शों व विचारों से काफी प्रभावित हुए। देशभर में राजा राम मोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद व महर्षि दयानन्द सरस्वती जैसे विचारक व समाज सुधारक समाज में फैले अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीतियों, गली-सड़ी परम्पराओं व जर्जर मान्यताओं के अंधकार से लड़ रहे थे। ‘आर्य समाज’ के विचारों के अनुरूप ‘डी.ए.वी. शिक्षा आंदोलन’ का सूत्रपात भी उन दिनों हो चुका था। डी.ए.वी. शिक्षा प्रणाली प्राचीन व नवीन का समन्वय थी। लाला जगत नारायण जी को राष्ट्रीयता, भारतीयता, प्रगतिशीलता, व्यक्तिगत साहस, निड़रता, निर्भीकता जैसे उच्च संस्कार अपने पूर्वजों से विरासत में प्राप्त हुए। भारत के प्रसिद्ध पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी, कुशल नेता, पंजाब केसरी पत्र समूह, हिन्द समाचार समूह, जग बानी अखबार के संस्थापक लाला जगत नारायण जी का जन्म 31 मई, 1899 को पिता लखमी दास व माता लाल देवी के घर वजीराबाद, गुजरांवाला जिले (अब पाकिस्तान) में हुआ था । लाला जी की प्रारम्भिक व माध्यमिक शिक्षा लायलपुर में हुई। विभाजन से पूर्व के पंजाब में लायलपुर अपनी शिल्प योजना, घंटा घर व सुन्दर तथा चौड़े बाज़ारों के लिए प्रसिद्ध था। यहां पर सनातनी, आर्य समाजी व खालसा पंथी विचारधारा से सम्बन्धित शिक्षण संस्थाएं थीं, इनके अतिरिक्त सरकारी स्कूल भी थे और यहीं पर भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय भी था। चोपड़ा परिवार लायलपुर(पाकिस्तान) में स्थित कचहरी बाज़ार तथा मुख्य बाज़ार के बीच एक गली में किराए का छोटा सा मकान था। इसी मकान के सामने एक प्रसिद्ध गुरुद्वारा था जिसके साथ ही खालसा मिडल स्कूल था। इसी स्कूल से लाला जी की औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ हुई। लाला जी इसी स्कूल में सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की, इसके पश्चात् लाला जी ने खालसा हाई स्कूल से 1915 में दसवीं की परीक्षा पास की। कुछ समय वकील बोध राज वोहरा के यहां श्री लखमी दास ने नौकरी भी की है। वकील बोध राज वोहरा लाला जगत नारायण जी की बुद्धि व कुशलता से अत्यन्त प्रभावित थे तथा उन्हें अपने पुत्र की ही भांति चाहते थे और उनकी यह इच्छा थी कि लाला जगत नारायण भी वकालत की शिक्षा ग्रहण कर उन के साथ मिल कर वकालत करे। वकील बोध राज वोहरा की राजनैतिक गतिविधियों का लाला जगत नारायण के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। लाला जी अपने हम उम्र बालकों की तरह हाकी या फुटबाल न खेलकर पुस्तकें पढ़ने में व्यस्त रहते थे।

लाला जी ने 1915 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद लाहौर के डी.ए.वी. कालेज में 1916 में बी.ए. की उच्च शिक्षा प्राम्भ की तथा राजनीति शास्त्र व अर्थ शास्त्र विषयों के साथ पढ़ाई शुरू कर दी और 1919 मे लाहौर के लॉ कॉलेज मे दाखिला लिया लेकिन विधाता का निर्देश तो अलग ही था। लाला जी 1920 मे वक़ालत की पढाई छोड़कर महात्मा गाँधी के अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गए। अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन में भाग लेने कार्यकर्त्ताओं की गिरफ़्तारी का सिलसिला शुरू हो गया, लाला जगत नारायण जी को भी इस आन्दोलन में भाग लेने के कारण 1921 में जेल भेज दिया गया। लाला जी को जेल में बहुत से कड़वे और मधुर अनुभव हुए और जब वह जेल की कोठरी में दाखिल हुए तो ‘वन्देमातरम्’ के नारों से उनका स्वागत किया गया। जेल में लाला जगत नारायण जी को लाला लाजपत राय, बाबा खड़क सिंह, डा. गोपी चन्द भार्गव, डा. किचलू, मोहम्मद जफर अली खां, मौलवी सईद हबीब, आगा मोहम्मद सफदर जैसे प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ रहे। जेल में वह अपने प्रिय नेताओं के लिए ‘वन्दे मातरम्’, ‘प्रताप’, ‘मिलाप’, ‘ट्रिब्यून’, ‘जमींदार’ व ‘सियासत’ चोरी-छुपे लाया करते थे, एक दिन जब अख़बारों की यह चोरी पकड़ी गई तो जेल के दारोगा खैरुद्दीन ने उन से दुर्व्यवहार किया तथा अपमानित भी किया। लगभग ढाई वर्ष जेल में रहने के बाद 1924 में जगत नारायण जेल से रिहा हुए। जब वह रिहा होकर घर पहुंचे तो युद्ध क्षेत्र से विजयी लौटने वाले योद्धा की तरह उनका स्वागत किया गया। 1924 में जब वह प्रथम बार जेल से रिहा होकर आए तो उनकी मुलाकात एक लोकप्रिय लेखक व नेता भाई परमानन्द से हुई। उस समय भाई परमानंद ‘विरजानंद प्रैस’ के मालिक थे तथा ‘आकाशवाणी’ नामक हिन्दी साप्ताहिक निकाल रहे थे। भाई परमानंद ने लाला जी को प्रति माह एक सौ रुपए वेतन तथा प्रैस व साप्ताहिक से होने वाले लाभ की बीस प्रतिशत राशि देने का प्रस्ताव दिया । फिर लाला जी ने ‘आकाशवाणी’ का सम्पादन तथा ‘विरजानंद प्रेस’ के प्रबंधन का कार्यभार सम्भाला। इस प्रकार राजनीति के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका प्रवेश हुआ। इसके बावजूद भी वह सभी सत्याग्रह आन्दोलनों का प्रमुख हिस्सा बने रहे।1924 में लाला जगत नारायण का विवाह लाला मुंशी राम पुरी की सुपुत्री शांति देवी जी से हुआ। लाला जी के घर 5 दिसम्बर, 1924 को पहली बेटी सन्तोष का जन्म हुआ, 24 दिसम्बर,1926 को बेटे रमेश चन्द्र, 24 अक्तूबर,1929 को पुत्री स्वर्णलता, 31 जनवरी, 1932 को बेटे विजय कुमार चोपड़ा, 5 जनवरी, 1935 को पुत्री संयोगिता, 10 अगस्त, 1937 को पुत्री सुदर्शन 15 अप्रैल 1939 को स्वराजलता, 7 मार्च, 1942 को पुत्री स्नेह, 21 अक्तूबर, 1945 को पुत्री सुधा, 25 जनवरी, 1948 को सब से छोटी बेटी शुभलता का जन्म हुआ। लाला जी के बच्चों में बड़ों के प्रति आदर था तथा सभी एक-दूसरे की इच्छाओं व भावनाओं का सम्मान करते थे और पारिवारिक मर्यादाओं का पालन किया जाता था। पारिवारिक जीवन के साथ-साथ उन्हें समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्य का भी ज्ञान था। देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए लगभग नौ वर्ष तक जेल में रहे। लाला जी की पत्नी को भी छ: महीने जेल काटनी पड़ी। देश के आजाद होने के उपरांत 1948 में लाहौर, पाकिस्तान से पलायन कर जालंधर, पंजाब में उर्दू दैनिक अखबार हिन्द समाचार, 1965 में दैनिक हिन्दी समाचार पत्र पंजाब केसरी, 1978 मे दैनिक पंजाबी समाचारपत्र जग बानी का शुभारंभ किया। बचपन से ही लाला जगत नारायण के लिए लाला लाजपत राय एक आदर्श, एक अनुकरणीय नेता तथा आदर व श्रद्धा का केन्द्र बिन्दु रहे। लाला जगत नारायण और लाला लाजपत राय का सम्बन्ध में आपस में हमेशा मधुर रहा और दोनों में ही राष्ट्र के प्रति सर्वस्व न्यौछावर कर देने का भाव था व दोनों ही लौह- लेखनी के धनी थे। 1928 में साईमन कमीशन भारत आया तो लाहौर रेलवे स्टेशन पर इस के विरुद्ध भारी जन प्रदर्शन किया गया, काले झंडों व “साईमन कमीशन गो बैक” के नारों से लाहौर गूंज उठा। लाला लाजपत राय के नेतृत्व में यह रोष प्रदर्शन हो रहा था और जनता में आक्रोश व जोश देखते ही बनता था। अंग्रेज़ अधिकारियों ने क्रोधित होकर पुलिस को लाठीचार्ज का आदेश दे दिया गया। जब पुलिस लाला लाजपत राय पर लाठिया बरसा रहे थे तो उस समय लाला जगत नारायण भी साथ थे। लाला जगत नारायण इस पूरे घटना क्रम के ऐतिहासिक प्रत्यक्षदर्शी थे। आजाद हिन्द फौज के निर्माता, ‘जय हिन्द’ के उद्घोषक, महान राष्ट्र नायक व युवा हृदय सम्राट नेता जी सुभाष चन्द्र बोस से लाला जी की मुलाकात तब हुई जब 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था। अधिवेशन के दौरान नेता जी सुभाष चन्द्र बोस लाला जी की प्रैस पर आए और उनका भाषण भी प्रेस से ही छपा था। लाला जी लाहौर सिटी कांग्रेस कमेटी के प्रधान बन चुके थे और इस दौरान कपूरथला हाऊस में एक सार्वजनिक सभा में पं. जवाहर लाल नेहरू के साथ उनकी मुलाकात हुई थी। इस के पश्चात भी वह कई बार नेहरू जी के सम्पर्क में आये। जगत नारायण में भी लाला लाजपत राय, पं. जवाहर लाल नेहरू, श्रीमती इन्दिरा गांधी, श्री भीमसेन सच्चर, शेख अब्दुल्ला, स. प्रताप सिंह कैरों आदि के सामने सच को सच कहने का साहस था। लाला जगत नारायण व उनका परिवार देश विभाजन के काले अध्याय के प्रत्यक्षदर्शी थे। लाला जगत नारायण 14 अगस्त 1947 को ही लाहौर छोड़ आए थे परन्तु अगस्त 1947 के अन्तिम सप्ताह में वह एक बार फिर लाहौर गए ताकि वह अपना कीमती सामान वापिस ले जा सकें परन्तु वह अपने घर तथा प्रैस तक पहुंच न सके क्योकि उन दिनों स्थिति और भी भयंकर तथा विस्फोटक हो चुकी थी। दूसरे शरणार्थियों की तरह लाला जी व उनके परिवार को भी पलायन करना पड़ा। उनका एक प्रिय साथी श्री हरबंस लाल मरवाहा उनके न चाहने के बावजूद भी उनकी माता, धर्मपत्नी और बेटियों को दो सप्ताह पहले करतारपुर ले आया था और उन्हें अपने एक रिश्तेदार कृष्ण देव कुमरा के घर रखा। जगत नारायण जी तथा उनके दोनों बेटे रमेश और विजय उनके साथ लाहौर में ही रहे। उन्हें आशा थी कि शायद वह वहां से कुछ कीमती सामान लाने में सफल हो जाएं ताकि नई जगह पर नया जीवन शुरू करने में कुछ सहायता मिल जाए पर ऐसा हो नहीं पाया। उनके जीवन का यह मध्य काल था। अब उन्हें पुनः एक नई शुरूआत करनी थी। उन जैसे और भी लाखों लोगों की ऐसी ही नियति थी। 4 अगस्त, 1947 को वह अपने दोनों पुत्रों, डा. गोपीचन्द भार्गव, स्वर्ण सिंह व अन्य मित्रों के साथ कारों में जालन्धर पहुंचे। करतारपुर शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था। लाला जी ने डिप्टी कमिश्नर से सम्पर्क किया जो कभी लाहौर में मैजिस्ट्रेट रह चुके थे। उन्होंने उन्हें करतारपुर जाने की अनुमति प्रदान कर दी। जैसे-जैसे वह जालन्धर से करतारपुर पहुंचे। शाम के छः बज चुके थे। वह डाकखाने में गए और पोस्टमास्टर से मिले। वह भी लाहौर से आया हुआ शरणार्थी ही था। लाला जी को डाकखाने में देखकर वह हैरान हुआ। वह उन्हें जानता व पहचानता था। जब लाला जी ने उसे बताया कि उनके परिवार ने इस शहर में ही कहीं शरण ले रखी है, पर ठीक पता उन्हें मालूम नहीं, शायद मोहम्मडन मोहल्ला के आस-पास कहीं। पोस्टमास्टर उन्हें साथ लगते थाने में ले गया क्योंकि शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था। थानेदार तथा पोस्टमास्टर ने लाला जी को साथ लिया तथा स्थानीय कांग्रेसी नेताओं से उनके परिवार के बारे में पूछा तो पता चल गया तथा उन्होंने लाला जी को उनके परिवार से मिला दिया। लाला जी को लेकर पूरा परिवार चिन्ता मग्न था। अगले ही दिन वह अपने दोनों बेटों रमेश व विजय को साथ लेकर जालन्धर गए। वहां के कांग्रेसी नेताओं से मिले पर घर की व्यवस्था न हो सकी। वह सेठ सुदर्शन से मिले और वह उन्हें जालन्धर में डी. टी. रोड पर के पी. बिल्डिंग के साथ स्थित एक बैंक के मैनेजर के पास ले गए, जो उनका मित्र था। मकान की बात हुई, बैंक मैनेजर ने लाला जी को कहा कि मकान तो अभी मिल जाएगा, लेकिन अभी उनमें दो मुसलमान भाई परिवार सहित रह रहे हैं और वह पाकिस्तान जाना चाहते हैं। उनमें से एक जालन्धर मुस्लिम लीग का प्रधान भी है। मैनेजर ने कहा कि आप उस मकान के बाहर कांग्रेस का झंडा लगा दें और आराम से रहें। मकान के पीछे के भाग में दोनों मुसलमान भाई परिवार सहित रहते रहे। बीच का दरवाजा बंद कर दिया गया। सारी व्यवस्था हो जाने के बाद लाला जी का बड़ा परिवार इन 2-3 कमरों में शिफ्ट कर गया। इसी बीच दोनों मुसलमान परिवार एक दिन चुपके से पाकिस्तान चले गए और लाला जी के परिवार को उनके जाने की भनक तक न लगी। लाला जी ने मुहल्ले के लोगों को इकट्ठा करके उनके सामने ही मकान का वह हिस्सा खोला जिसमें मुसलमान परिवार रहते थे और उनके कमरे से मिला सारा सामान, जालन्धर स्थित इमाम नासिर मस्जिद में जमा करा दिया गया ताकि शरणार्थियों के काम आ सके। लाला जी का परिवार इन दिनों जिस मकान में रह रहा है, यह वही मकान है जिसमें दोनों मुसलमान भाई रहा करते थे। लाला जी व उनके परिवार ने इन दिनों जो शारीरिक व मानसिक पीड़ा झेली उस सब का विस्तार से वर्णन नहीं किया जा सकता, केवल उसे महसूस किया जा सकता है। भारत-पाक विभाजन के बाद लाला जी ने “जय हिन्द” नामक दैनिक अखबार निकाला जो विभाजन से पहले लाहौर में श्री वीरेन्द्र निकालते थे। वह दिल्ली गए तथा श्री वीरेन्द्र के पिता महाशय कृष्ण से मिले तथा पत्र को निकालने की अनुमति प्राप्त कर ली। श्री वीरेन्द्र को पार्टनर बना लिया गया। 1924 से लेकर अब तक लाला जी ने जो भी लिखा, जब भी लिखा, किसी उद्देश्य के लिए तथा अपने इस सिद्धान्त पर वह आयुपर्यन्त चलते रहे। पाकिस्तान से आए हजारों लाखों लोगों-शरणार्थियों की दशा बड़ी दयनीय थी। सरकारी अधिकारियों का रवैया इन के प्रति सहानुभूति पूर्ण होने की बजाय उपेक्षापूर्ण था। लाला जी ने शरणार्थियों की दुर्दशा पर लेख लिख कर प्रशासन व सरकार का ध्यान आकृष्ट किया। उस समय की गोपी चन्द भार्गव सरकार को अपनी आलोचना सहन न हुई तथा उन्होंने वीरेन्द्र पर दबाव बनाया कि वह अपना समाचारपत्र लाला जगत नारायण से वापिस ले ले और ऐसा ही हुआ। लाला जी की अनुपस्थिति में ही उन से यह समाचार पत्र वापिस ले लिया गया। सब कुछ अचानक ही हो गया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 1974 में जब ज्ञानी जैल सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने भी पंजाब ‘केसरी’ व ‘हिन्द- समाचार की आवाज को दबाने व कुचलने की कोशिश की। उन्होंने पहले दोनों समाचारपत्रों को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापन बन्द का दिए,लेकिन इसका लाला जी पर कोई प्रभाव नहीं हुआ तो उन्होंने हिन्द समाचार कार्यालय की बिजली आपूर्ति ही बन्द कर दी। लाला जी की प्रेरणा व इच्छा शक्ति से ट्रैक्टर लगा कर प्रिंटिंग मशीन चलाई गई तथा समाचारपत्र छापे गए, वितरित हुए तथा एक नया इतिहास रचा गया। देश भर के व विदेशी समाचारपत्रों में इस की चर्चा हुई तथा प्रैस की स्वतन्त्रता पर हुए सरकारी प्रहारों के विरुद्ध लेख व सम्पादकीय भी प्रकाशित हुए। स्वतंत्रता से पूर्व तथा स्वतंत्रता के बाद भी लाला जगत नारायण राष्ट्र हित व जन हित में जेल यात्राएं करते रहे। जीवन के कई वर्ष जेल की कोठरियों में बीते। जेलों में शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न व यातनाओं का सामना भी करना पड़ा। लाला जगत नारायण जी को 1975 में आपात्काल के दौरान भी जेल जाना पड़ा क्योंकि उन्होंने सत्तासीन नेताओं की तानाशाही, निरंकुशता व लोकतन्त्र घातक कार्य-कलापों के विरुद्ध प्रबल आवाज़ उठाई थी। 26 जून 1975 को सायं उन्हें उन के घर के सामने से गिरफ्तार कर लिया गया और वह 19 महीनों तक जालन्धर, फिरोजपुर, संगरूर, नाभा व पटियाला की जेलों में रहे। उनकी आयु 76 वर्ष की थी। जेल में वह अत्यधिक बीमार हो गए तथा दो बार आप्रेशन करवाने पड़े। डाक्टरों ने पंजाब सरकार को परामर्श दिया कि लाला जी को जेल में और रखना खतरे से खाली नहीं होगा। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने रिहाई के लिए शर्त रखी कि रिहा होने के बाद लाला जी राजनैतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेंगे परन्तु लाला जी ने कोई भी शर्त मानने से साफ इन्कार कर दिया। 1977 में जनवरी में पटियाला जेल में उन्हें हार्ट अटैक भी हुआ। पर उन्होंने हार नहीं मानी। पंजाब सरकार को उन्हें बिना किसी शर्त छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। पंजाब अलगाववाद, उग्रवाद व आतंकवाद से जकड़े हुए थे। राज्य में शांति कायम करने के कई प्रयास किए। लाला जी खालिस्तान आंदोलन के आलोचक थे और वह पहले जनवरी 1981 में एक हत्या के प्रयास में बच गए थे। अक्सर पंजाब में आंतकवाद फ़ैलाने वाला जरनैल सिंह भिंडरावाला स्वर्ण मंदिर में अपनी कई भाषणों में लाला जी को जान से मरने की धमकिया देता रहता था क्योकि वह लाला जी के आतंकियों के मंसूबों को उजागर कर देने वाले लेखनों से बहुत परेशान था। 9 सितम्बर 1981 को जालन्धर से पटियाला की यात्रा कर रहे थे। पटियाला पहुंचकर लाला जी एक नेत्र शिविर समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे और उन्होंने अपने भाषण में इस पुण्य कार्य की सराहना की, आयोजकों को बधाई दी तथा भविष्य में भी इसी प्रकार के लोक कल्याणकारी कार्य करते रहने की प्रेरणा दी। समारोह के बाद लाला जी अपने प्रशंसकों व शुभचिन्तकों से घिरे रहे। फिर लाला जी जालंधर जाने के लिए अपनी गाडी की पिछली सीट पर बैठ गए। उनका ड्राइवर सोमनाथ आशंकित मन से कार चला रहा था। पटियाला से जालन्धर जाने वाली सड़क पर कार दौड़ रही थी। इस दौरान ड्राईवर ने देखा कि तीन अज्ञात मोटरसाइकिल सवारों द्वारा कार का पीछा किया जा रहा है। पहले उसने इसे अपना भ्रम समझा। परन्तु जब उसे यकीन हो गया तो उसने आहिस्ता से लाला जी को सजग करते हुए बताया कि कुछ अज्ञात युवक कार का पीछा कर रहे हैं। लाला जी ने उसे आश्वस्त किया घबराओ नहीं, कुछ नहीं होगा।” लुधियाना से जालन्धर की ओर जी.टी. रोड पर कादियों के टूरिस्ट बंगले के समीप मोटर साइकिल पर सवार तीन नवयुवकों ने कार के समीप आ कर निकट से लाला जी पर गोलियां चला दीं। सोमनाथ ने कार को वापिस मोड़ कर लुधियाना की ओर ले जाना भी चाहा परन्तु सड़क पर मिट्टी के पड़े ढेरों के कारण वह ऐसा न कर पाया। उसे भी गोली लगी तथा घायल हो गया। पर लाला जी पर गोलियों के घाव इतने गहरे थे कि उनकी वही पर मौत हो गयी। कुछ समय बाद दो पुलिस के सिपाही घटनास्थल पर पहुंचे। पुलिस ने घायल ड्राईवर को सी.एम.सी. अस्पताल, लुधियान में भेज दिया। अब तक कुछ और लोग भी घटना स्थल पर इकट्ठे हो चुके। थे। लाला जी की पहचान हो गई थी। एक व्यक्ति ने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए निकट ही स्थित एक मिल के कार्यालय से फोन द्वारा हिन्द समाचार पत्र समूह के कार्यालय में यह दुःखद समाचार दे दिया। लाला जी के बड़े बेटे श्री रमेश ने जैसे ही फोन सुना, सन्नाटा सा छा गया। हिन्दू-सिक्ख एकता के लिए, राष्ट्र की अखंडता के लिए लाला जी ने 9 सितम्बर 1981 को अपना बलिदान दे दिया। अगले दिन देश भर के समाचार पत्रों ने इसी दुःखद समाचार व हत्याकांड के बारे में लिखा। विभिन्न राजनैतिक दलों के शीर्ष नेताओं, राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी सहित प्रमुख नेताओं व प्रख्यात पत्रकारों ने इस ‘जघन्य व अमानवीय कृत्य’ की निन्दा की जगह-जगह शोक सभाएं आयोजित हुई। शोक प्रस्ताव पास किए गए। लाला जी की निर्मम हत्या’ पर पंजाब में पूर्ण हड़ताल रही। कहीं-कहीं रोष भरे प्रदर्शन भी हुए।

10 सितम्बर, 1981 को सायं पांच बजे बलटर्न पार्क के विशाल मैदान में “लाखों सजल नयनों द्वारा लाला जगत नारायण को अन्तिम विदा” दी गई। “पंजाब के वीर सपूत” की “राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि” सम्पन्न हुई। “लाला जी अमर रहें।”, “”जब तक सूरज चांद रहेगा, लाला जी का नाम रहेगा।” के नारों के बीच वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ उन के पार्थिव शरीर को अग्नि दी गई। स्वयंभू नक्सली नछत्तर सिंह रोडे को अपराध स्थल से गिरफ्तार कर लिया गया। मामले में दो अन्य आरोपी दलबीर सिंह और स्वर्ण सिंह रोडे हैं। जरनैल सिंह भिंडरावाले को लाला जी की हत्या के आरोप में पहली बार गिरफ्तार किया गया था, लेकिन भिंडरावाले की रिहाई की मांग को लेकर 29 सितंबर 1981 को उसके समर्थकों ने इंडियन एयरलाइंस के एक विमान का अपहरण कर लिया गया। भारत सरकार द्वारा जारी श्वेत पत्र में उल्लेख किया गया है कि भिंडरावाले की आलोचना के कारण, संत निरंकारियों और अखंड कीर्तनी जत्था के सदस्यों के बीच हुई झड़प के दौरान मौजूद होने के कारण और भिंडरावाले के खिलाफ करनाल मुकदमे में गवाह बनने के कारण लाला जी की हत्या की गई थी। भारत के केंद्रीय गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने संसद में घोषणा की कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि भिंडरावाले लाला जगत नारायण की हत्या में शामिल था और 15 अक्टूबर 1981 को रिहा कर दिया गया। लेकिन हत्यारों को उम्रकैद की सजा हो गयी थी। बता दे कि लाला जगत नारायण लाहौर नगर कांग्रेस समिति के 7 वर्ष तक अध्यक्ष रहे और लाहौर नगरपालिका में कांग्रेस पार्टी के नेता रहे और 30 से अधिक वर्षों तक पंजाब राज्य कांग्रेस समिति के सदस्य रहे। लाला जगत नारायण के बाद उनके बड़े पुत्र श्री रमेश चन्द्र ने पत्र समूह की बागडोर अपने हाथों में सम्भाल ली। उन्होंने भी लाला जी के पदचिन्हों का ही अनुसरण किया तथा वह भी एक दिन असामाजिक, अलगाववादी व राष्ट्र विरोधी तत्वों के हाथों राष्ट्र की एकता व अखंडता हेतु शहीद हो गए। श्री रमेश चन्द्र के बलिदान के बाद लाला जी के छोटे बेटे श्री विजय कुमार चोपड़ा ने कलम सम्भाली। आतंकवाद के दौरान इन दो अमर शहीदों के साथ-साथ हिन्द समाचार पत्र समूह के 2 न्यूज एडीटर, 1 चीफ सब एडीटर, 12 प्रैस रिपोर्टर व प्रैस फोटोग्राफर, 2 ड्राईवर, 44 एजैंट, सब एजैंट हॉकर आदि ने अपना बलिदान दिया।File:Manmohan Singh releasing the commemorative postage stamp in memory of Lala Jagat Narayan, in New

गौरतलब है कि 1998 में कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में लाला जी के नाम पर एक पीठ स्थापित की गई और 9 सितंबर 2013 को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमर शहीद लाला जगत नारायण की स्मृति में एक डाक टिकट जारी की।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!